गुरुवार, 4 सितंबर 2014

देवते सोने मढ़ेयो खरे



अनपढ़ां  ते  पढ़ेयो खरे।
पढ़ेयां ते  कढ़ेयो खरे।।

जीणा कितणा छुप छपीतें।
कुतकी कदकी रढ़ेयो खरे।।

छडणा पोणा लुक लकाड़ा।
दड़ेयां  ते अड़ेयो  खरे।।

है पतालेंÞ हंडणा  कितणा।
गास्सें कदकी चढ़ेयो खरे।।

खिट्टां ने नी मुकणा सफरें।
कदकी बैठेयो, खड़ेयो खरे।।

थी जलेब, बजंतरी फाकें।
देवते सोने मढ़ेयो खरे।।

तिसदें अग्गें पेश नी चलें।
वक्तें लक्कड़ घड़ेयो खरे।।

प्रेमां खातर सर कटाणे।
हकां खातर लड़ेयो खरे।।

शुक्रवार, 28 मार्च 2014

सोशल मीडिया पर तो छाए पर सोशल कहां रह पाए

सूचना क्रांति ने तोड़ा सामाजिक ताना-बाना, मिलना-जुलना हुआ कम

सोशल मीडिया का धड़ल्ले से प्रयोग हो रहा है। किसी ने फेसबुक, ट्विटर या पहाड़ीरूट्स पर स्टेट्स अपडेट को अपनी दिनचर्या में शामिल कर लिया है तो कोई वॉट्सएप पर अपनी हर अपडेट शेयर करने को अपनी प्राथमिकता समझने लगा है।

ट्वीटर पर अपनी उपस्थिति का एहसास करवाने में भी कोई पीछे नहीं है। सोशल साइट्स पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मस्ती में डूबे लोग कितने सोशल रह पाए हैं, यह अहम सवाल है। लोकसभा चुनाव सिर पर हैं। नेताओं को अपनी बात हर मतदाताओं तक पहुंचानी है। जाहिर है कि सूचना क्रांति के इस युग में सोशल मीडिया की ताकत का अंदाजा नेताओं को भी है और यह भी पता है कि मतदाता की नब्ज पर हाथ कैसे रखना है। नेता लोग सोशल मीडिया का जमकर प्रयोग कर रहे हैं। ये वही नेता लोग हैं, जो सामान्य वक्त में इतने हाई प्रोफाइल होते हैं कि मतदाता की पहुंच से बाहर होते हैं। कई नेता तो ऐसे भी हैं कि सिर्फ चुनावी मौसम में ही नजर आते हैं। कहीं कॉरपोरेट स्टाइल है तो कोई बिजनेस में व्यस्त है। ऐसे नेताओं के सामाजिक सरोकार तभी जागते हैं, जब बात वोटों के गणित की होती है। ये नेता सोशल मीडिया पर खुद को व्यक्त करने में सबसे आगे हैं। ज्यादा वक्त नहीं हुआ, जब गांव-मुहल्ले के किसी एक घर में शादी होने पर सारा गांव अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभाने में जुट जाता था। धाम के लिए लकड़ी के प्रबंध की जिम्मेवारी गांव के मर्दों के हिस्से होती थी तो, गांव की स्त्रियां धाम के लिए चावल-दाल छांटने का काम करतीं थीं। इस बीच लोक संगीत, गप्प- शप खूब चलती थी। चौपालों पर गांव के वरिष्ठ नागरिक आम जीवन के मसलों पर एक-दूसरे से चर्चा करते थे। तकनीक के जीवन में हावी होने से हमारा सारा सामाजिक ताना-बाना बुरी तरह से टूट गया है।

गांव और पास-पड़ोस की बात तो दूर की, हकीकत तो यह है कि अब हम पारिवारिक आयोजनों में भी मोबाइल संदेश भेज कर अपने सोशल होने की जिम्मेवारी निभाने लगे हैं।

रविवार, 25 अगस्त 2013

सुतेया तूं उठ, बैठेया तू चल

सुतेया तूं उठ, बैठेया तू चल
तेरी बणी जाणी गल, तेरी बणी जाणी गल
मना दे मसले दा मिली जाना हल 
तेरी बणी जाणी गल, तेरी बणी जाणी गल

सुरक्षा और प्राथमिकता


वो लोग भूख से इतने डरे हैं 
खा जाना चाहते हैं 
हर गरीब के हिस्से की रोटी
उनके पास कहां है दम 
जो दे सकें 
जिंदगी को चुनौती 
हर रोज 
वो लूट लेना चाहते हैं 
अपनी अगली नस्लों के लिए
दुनिया भर के खजाने
वो सुरक्षित करना चाहते हैं
अपने कुनबे का भविष्य
वो मेरी तरह कभी
कविता लिखने का
जोखिम नहीं लेते
क्योंकि , उनको
गीत संगीत जिंदगी
सबसे जरूरी है आर्थिक मजबूती
अपनी प्राथमिकता उन्हें
हर दम याद रहती है
हालांकि,
जीवन उनके लिये
उत्सव से ज्यादा स्टॉक एक्सचेंज है

नी सैह सोगां नी सैह कुआल रेह।।

कुड्डी च जां तक जलदे म्याल रेह।
धारां हन गददी कडदे स्याल रेह।।

कदी गत होई नी घरे देयां गुरुआं।
अपु जो छिलदे खुन्ने क्दाल रेह।।

चेले दा कारोबार चमकदा खूब रेहा।
कुथी तां चढ़ेलां कुथी तां बताल रेह।।

घर तां गवाह रेह जीणे कने मरने दे।
चडियां बाराती कदी पोंदे न्काल रेह।।

मितर सुदामा रख चनेयां दी आस ।
राजे दें घरें कुथु मोतियां दे काल रेह।।

जेहडा अमीर था पैसे दा ही पीर था।
दौलता तां वाले दिलां दे कंगाल रेह।।

तिन्हा सोंगी हंडे थे पैरां पतराणेयां।
नी सैह सोगां नी सैह कुआल रेह।।

वही आंख में वही सांस में बसा देखा।।

एक बच्चे के आगे जो झुक कर देखा।
पहली मर्तबा बड़े करीब से खुदा देखा।।

इक फ़कीर मैं उसकी झलक दिखाई दी।
डूब कर मस्ती में बन्दगी में रमा देखा।।

उसकी नेक जुबां में भी बसता रहा वर्षों। 
कहीं किसी माँ की दुआ में मिला देखा।।

उसी का तेज़ लगी कभी पाश की नज्में।
शिव की हसीन गजलों में भी घुला देखा।।

कभी अन्द्रेटा में जिसका था सृंगार हुआ।
दारजी की उस गद्दण के रंग रंगा देखा।।

देखा जिसने भी दिल की नजर से उसे।
वही आंख में वही सांस में बसा देखा।।

खुद के विरुद्ध युद्ध


ऐसे में जबकि 
सच का हर रास्ता
अवरुद्ध है। 
अपनी शर्तों पर 
जीने के लिए 
खुद के विरुद्ध 
लड़ना एक युद्ध है।
मेरे जैसे कितने 
उसी युद्ध में रत हैं
यह कैसा जनमत है।
जिन्हें उड़ना है वो उडें उंचे आसमानों में।
हमें तो सकूं मिलता है पहाड़ी ढलानों में।।


अपने कमरे में नितांत अकेला हूं 
ऑनलाइन बेशक दोस्त हजार हैं


हम को अपनी औकात मालूम है यार मगर 
यह आपकी हैसियत है हमारा भी मोल पड़ा


गम को यह सोच के मेहमान किया।
हुस्न वालों ने है उसे परेशान किया।।


जो शामिल नहीं होगा चोरों की बारात में।
वो तो अखरने लगेगा अपनी जमात में।।


महंगाई नें भ्रष्टाचार को राखी पहनाई।
देश को रक्षा बंधन की बहुत बधाई।।

तैयारी पूरी हो तो मरने का भी मज़ा आयेगा।
सुना है लेने हमको मौत का फ़रिश्ता आयेगा।।


जिंदगी की ढलान पर उम्मीदें कितनी परवान रखीं।
गर्दिशों में भी अपने बुजुर्गों ने जीने में शान राखी।।


हार जाने का कोई भी जोखिम उठाया नहीं उसने।
इस वजह से कभी खुद को अपनाया नहीं उसने।।


खुद के आगे वही शख्स हर दिन बेनकाब होता है 
चेहरे पर जिसके नित नया दिन नकाब होता है।।


उसने मेरी हर जरूरत का ध्यान रखा।
मैंने भी उसको अपना भगवान रखा।।