मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

लोगों को ही लूटते लोकतंत्र देखे गए

धनवान जितने थे, पवित्र देखे गए.
और जो गरीब थे,  चरित्र देखे गए.

व्यवहार एकाएक विचित्र देखे गए.
मुसीबत के वक्त जब मित्र देखे गए.

नजाकत के दौर में ऐसे पात्र देखे गए.
पसीने पर जो भारी पडे इत्र देखे गए .

जब भी उनकी जीत के सूत्र देखे गए
वश में करने के तंत्र- मंत्र देखे गए.

जवानी में लौटने को चित्र देखे गए.
औ रूमानी दौर के प्रेम पत्र देखे गए.

सियासी गठजोड़ के ही सत्र देखे गए.
लोगों को ही लूटते लोकतंत्र देखे गए.


  






   



शनिवार, 30 जनवरी 2016

हम ठहरे फेसबुक की तरह और वो रहे ट्वीटर की तरह



जिस रेस्टोरेंट में आते हो आप कस्टमर की तरह.
रोटी के लिए काम करते हैं वहां हम वेटर की तरह.

बचपन के चंद दोस्त मिले अरसे बाद कुछ यूँ कर,
गुलाबी सर्दी में पंसदीदा पुराने किसी स्वेटर की तरह

जब तेरी याद आती है तो में फिर से लौट जाता हूँ,
कालेज के दिनों के उस पहले लव लैटर की तरह.

जलता है तन्हाई की रात में कोई आशिक पगला,
कडाके की ठण्ड में लगातार किसी हीटर की तरह.

कुछ कबीर को पढ़ लिया, कुछ फ़कीर मिल गए,
तब से अपना घर भी लगने लगा क्वार्टर की तरह.

मुकद्दर की पैमाईशों में भी साजिशें खूब हुई होंगी,
हम फुट की तरह और वो कद्दावर मीटर की तरह.

स्लेट की छतों से निजात पाई,आप भी देख लीजिये,
विकास उग आया है खूब पहाड़ पर लेंटर की तरह.

हमारे तो सब अधिकार बस आपके ही मोहताज़ रहे,
हम रहे स्टेट की तरह और आप हमेशा सेंटर की तरह.

जिन्हें परिभाषित किया है मीडिया ने लीडर की तरह,
लूटते रहे मिलकर मेरे देश को वही बड़े चीटर की तरह

सोशल मीडिया में भी उनके नाम का ख़ास रूतबा रहा,
हम ठहरे फेसबुक की तरह और वो रहे ट्वीटर की तरह.

ओरडीनरी से लेकर वॉल्वो तक के सफ़र में साथ रहे पर,
उस्ताद आप ही रहे, हम तो रहे बस कंडक्टर की तरह.

सुना है कंगना ब्रांड एम्बेसडर बन गयी अपने प्रदेश की,
पर कई कमलाह अब भी खड़े हें किसी खंडहर की तरह.

...........विनोद भावुक.................










मंगलवार, 26 जनवरी 2016

करदा कोई डाइटिंगा खांदा उब्बली के.

घोलां जे लगे तां हंडणा भी लगी पोंणा, 
इक दिन खिटां भी लगाणीयां छोरुआं

एथू तां फाकेयां हन हड्ड भी गाली ते, 
करदा कोई डाइटिंगा खांदा उब्बली के.

प्यांदे न पाणी जिथू तां छाबिलां लगाई के 
बिकणा लग्गा पाणी ओथू बोतल च पाई के

मेले में मिठास जलेबियों ने की है

तालों से शरारत चाबियों ने की है।
दरवाजों से गुफ्तगू खिड़कियों ने की है।।
कहते हुए ये बात बागवां को सुना कि।
गुलों से साजिश तितलियों ने की है।।
मधुमास कोई जब वनवास हुआ है ।
मेहंदी से शिकायत हथेलियों ने की है।।
किलकारियां तो बस्तियों तक रही हैं।
वारिसों से नफरतें हवेलियों ने की है।।
ससुराल से मायके में आना हुआ है ।
नवेली से चुहल सहेलियों ने की है।।
कुत्तों का काम तो भौंकना ही रहा है।
रात को मेहनत बिल्लियों ने की है।।
दिन तो रंगीन होलियों ने किये हैं ।
और रात रोशन दीवालियों ने की है।।
सरकारी नजर में रईस जो हो गए।
भूख से बगावत थालियों ने की है।।
जिस्म के रेशम से घर बना लिए हैं ।
जालों से चाहत मकड़ियों ने की है।।
गरीब के घर फिर चूल्हा नहीं जला ।
साजिश जब भी लकड़ियों ने की है।।
टमक बजा कर शुरू हुआ है दंगल ।
मेले में मिठास जलेबियों ने की है।।
बेशक दरगाह पर खूब सजदे हुए हैं ।
पाक इबादत तो कव्वालियों ने की है।।

पहलें लाणा पोने गितलू

दिलां दा रोग रंगाडी कुसजो क्या दसणा?
अपणा टिड्ड कुआड़ी कुसजो क्या दसणा ?

तां खुलने हास्से दे भितलू 
पहलें लाणा पोने गितलू

हस्सी लैया, खेली लेया, दिक्खी लेया जग,
मरी जाना जाहलू लोकां फूकी देणी अग्ग.

अनपढ़ पुहाल, शिवपुराण क्या करणा


छिणियां, थौहड़ू, बदाण क्या करणा।
जंगांह-बांही नी त्राण, क्या करणा।।
चाल़ेयां चेले देयां चाचू फसी मोआ।
संग्गैं आई फसे प्राण, क्या करणा।।
बैडरूमैं तिन्हां दें लग्गे डबल बैड्ड।
ऐथू पंदी पर है बछाण, क्या करणा।।
नदियां सुक्कियां रेह बरसातकड़ नाल़े।
चौंह घडिय़ां दा उफाण, क्या करणा।।

तां अर्जुने दा तीर कमाण क्या करणा।
मारे धरती हेठ जे बाण क्या करणा।।
शंभू बणी के सैह भेडां रेहया चारदा।
अनपढ़ पुहाल, शिवपुराण क्या करणा।।
तोंद जांभी तपी तां झरी गेया मोआ।
बरसाती सैह पाणी कडाण क्या करणा।।

नी समझाणी अपनी लाड़ी बडक़ा जी

असां अनाड़ी तुंसा खलाड़ी बडक़ा जी।
सबतों बखरी ठुक तुहाड़ी बडक़ा जी।।
तिस टब्बरे दी हालत माड़ी बडक़ा जी
जिसदा मेड़ी, बड़ा गराड़ी बडक़ा जी।।
सुखें सौणा, इसा गल्ला गठी बन्नी लैह।
नी समझाणी अपनी लाड़ी बडक़ा जी।।
बाड़ां देई जां बचाई गांई-सूअरां तें।।
दित्ती बांदरां फसल उजाड़ी बडक़ा जी।।
हर कुसी ने नी बगाडऩी बडक़ा जी।
सदा नी रखणी खड़ी कयाड़ी बडक़ा जी।।
रुकदी बेशक हड़सर गाड़ी बडक़ा जी।
अपणी तां फुक छतराड़ी बडक़ा जी।।
पल्लैं सबकिछ, किस्मत माड़ी बडक़ा जी।
सै डलहौजी, असां चुआड़ी बडक़ा जी।।
गास्से पर नित ही नी बदलां दी चल्लैं।
निकलैं सूरज बदलां फाड़ी बडक़ा जी।।
इंगलिश तां हुण दुनिया बोलणा लग्गी है।
लिखदा भावुक गीत पहाड़ी बडक़ा जी।।

बड़े गराड़ी लुढक़दे मिल्ले।


अणपढ पंडे भुडक़दे मिल्ले।
हन मशटंडे बुडक़दे मिल्ले।।
कुछ थे कालु हट्टिया बैठी।
चणेयां जो ही तुडक़दे मिल्ले।।
होए छग्गे तां लाग्गे लग्गे।
दुंदु थे तां दुडक़दे मिल्ले।।
दाणे निसरे तां पुज्जे तोत्तेे।
बरसाती मीनक उडक़दे मिल्ले।।
तारू दिक्खे, पतणां रूड़दे।
बड़े गराड़ी लुढक़दे मिल्ले।
नोट खुडक़दे जिन्हां जो रेहंदे।
लाले सैह कुडक़दे मिल्ले।।

भला कौन देखता है जा घर लुहारों के


दिल से कभी पूछ लिया पहरेदारों के।
बेपर्दा राज हो गए कई इज्जतदारों के।।
ब्रांड की डिमांड में तो मिडल क्लास भी।
हैं लोग आदी हो गए अब इश्तहारों के।।
बाज़ार का विकास भी दिखने लगता है।
आ जाते हैं जब भी मौसम त्यौहारों के।।
लोहा कूट कर जो यहां रोटी कमाते रहे।
भला कौन देखता है जा घर लुहारों के।।
धीरे बोलने की आदत डाल लो या फिर।
अजी कभी तो मरोडिये कान दीवारों के।।
अभिनय था बनावटी, अदाएं दिखावटी।
जब चरित्र में ही खोट थी किरदारों के।।
तेरी आरजू में तो बसे मेट्रो के मॉल हैं।
और मेरी हसरतों में है साए देवदारों के।।